निम्बार्क सम्प्रदाय मे एकादशी व्रत छोडकर महाद्वादशी व्रत क्यो किया जाता है❓
आप सभी भक्तो ने अक्सर देखा होगा कि निम्बार्क सम्प्रदाय मे कई बार ऐसा होता है कि एकादशी की जगह महाद्वादशी व्रत करने की आज्ञा दी जाती है, अन्य सम्प्रदाय वाले तो भ्रमित होते ही है कई बार निम्बार्क सम्प्रदाय के भक्तो को भी समझ नही आता है कि आखिर ऐसा क्यो किया जाता है....अतः आज के लेख को पढकर आप सबके मन मे जो प्रश्न उठते है वो हमेशा के लिए खत्म हो जाएगे और आप भी एकादशी छोड़कर महाद्वादशी व्रत करना प्रारंभ कर देगे....
धर्म शास्त्रों मे आठ महाद्वादशी व्रतो का उल्लेख मिलता है, जिनके नाम इस प्रकार है...जया महाद्वादशी, विजया महाद्वादशी, जयन्ती महाद्वादशी, पापनाशिनी महाद्वादशी, उन्मीलिनी महाद्वादशी, वंजुलिनी महाद्वादशी, त्रिस्पृशा महाद्वादशी और पक्षवर्धिनी महाद्वादशी व्रत।
ये महाद्वादशी आखिर आती कब है कब इनका योग बनता है ??
१) जब किसी भी महिने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी पुनर्वसु नक्षत्र से युक्त हो तो उसे " जया महाद्वादशी " कहते है।
२) जब किसी महिने मे कृष्ण पक्ष अथवा शुक्ल पक्ष की द्वादशी श्रवण नक्षत्र से युक्त हो तो उसे " विजया महाद्वादशी " कहते है।
३) यदि कोई द्वादशी रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो उसे " जयन्ती महाद्वादशी " कहते है।
४) जब कोई द्वादशी पुष्य नक्षत्र से युक्त हो तो उसे " पापनाशिनी महाद्वादशी " कहते है।
५) जब कोई एकादशी पुर्ण हो और दुसरे दिन भी कुछ एकादशी हो तो वह " उन्मीलिनी महाद्वादशी " कहलाती है।
६) यदि एकादशी और द्वादशी सम्पुर्ण हो और फिर त्रयोदशी को भी कुछ अवशिष्ट हो तो वह " वंजुलिनी महाद्वादशी " कहलाती है।
७) जब द्वादशी का क्षय होकर रात्रि शेष मे त्रयोदशी हो तो वह " त्रिस्पृशा महाद्वादशी " कहलाती है।
८) यदि अमावस्या व पुर्णिमा दो हो जाय तो वह " पक्षवर्धिनी महाद्वादशी " कहलाती है।
यदि ऐसा कोई योग बनता है तो संभव हो सके तो एकादशी व महाद्वादशी दोनो का व्रत करना चाहिए और यदि दोनो व्रत न कर सको तो इस परिस्थिति मे एकादशी व्रत को छोड़कर महाद्वादशी का ही व्रत करना चाहिए यही शास्त्रों की आज्ञा है....
एकादशी भवेत्पूर्णा परतो द्वादशी भवेत्।
तदा ह्येकादशीं त्यक्त्वा द्वादशीं समुपोषयेत्।। ( स्कन्द पुराण )
अर्थं :- एकादशी पूर्ण हो अर्थात पूर्व तिथि दशमी विद्धा न हो और अग्रिम तिथि द्वादशी महाद्वादशी के रुप मे हो, तब ऐसी स्थिती मे एकादशी तिथि मे एकादशी व्रत को त्याग कर महाद्वादशी के दिन व्रत करना चाहिए....यही शास्त्रीय विधान है।
पर्वाच्युतजयावृद्धौ, ईशदुर्गान्तकक्षये।
शुद्धाप्येकादशी त्याज्या द्वादश्यां समुपोषणम्।। ( ब्रह्मवैवर्तपुराण )
अर्थ :- पर्व ( पुर्णिमा, अमावस्या ) अच्युत ( द्वादशी ) जया ( त्रयोदशी ) की वृद्धि हो और ईश ( अष्टमी ) दुर्गा ( नवमी ) अन्तक ( दशमी ) इनमे से किसी एक का क्षय हो तो शुद्धा एकादशी छोड़कर भी द्वादशी मे व्रत करे ।
अतः हमने आज जाना की आखिर क्यो एकादशी व्रत त्यागकर महाद्वादशी व्रत करना चाहिए, जब भी महाद्वादशी व्रत आवे तो आप संभव हो सके तो एकादशी और महाद्वादशी दोनो व्रत करे और यदि संभव न हो तो एकादशी व्रत छोड़कर महाद्वादशी व्रत करे....लेकिन ध्यान रहे व्रत अपनी मर्जी से न करे निम्बार्क पंचांग अनुसार जब महाद्वादशी व्रत की घोषणा की जाती है तब ही एकादशी व्रत छोड़कर महाद्वादशी व्रत करे।
उक्त लेख अखिल भारतीय जगदगुरु श्री निम्बार्काचार्य पीठ से प्रकाशित " व्रत पंचक " पुस्तक व " निम्बार्क व्रतोत्सव पंचांग " से लिया गया है 🙏
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[ हर क्षण जपते रहिये ]
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